Wednesday, September 23, 2009

पूरब और पश्चिम

मैंने काशिफ भाई के ब्लॉग पर एक कमेन्ट दी है, उसी को पोस्ट बनाकर यहाँ लिखा गया है काशिफ के उस ब्लॉग पेज का लिंक नीचे दे रहा हूँ | कोई भाई पोस्ट को यहाँ भी पढ़ सकता है पर कमेन्ट के रूप में देखना चाहे तो इस लिंक पर जा सकता है |

हमें नही चाहियें ऎसा राष्ट्ध्रम और ऎसी देशभक्ती..!!

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@ काशिफ
काशिफ साहब, वैसे तो ज्यादातर बातें ऊपर के कमेन्ट में लिखी जा चुकी हैं | लेकिन जिस विषय पर कोई संतुष्टि वाला कमेन्ट मुझे नहीं लगा वो है मूर्ति पूजा |

काशिफ साहब मैंने आपकी जगह-जगह टिप्पणियों को पढ़ा है और इसलिए आज उकता कर ये आगे एक लम्बी कमेन्ट लिखने जा रहा हूँ, मुझे आपसे पूरी आशा है कि आप इसे एक रेवेंज़ के नज़रिए से नहीं शुद्ध विचारों कि तरह देखेंगे | ये उन लाइनों के जवाब में है जिनमे आप यदा कदा हिन्दुओं के किसी एक पक्ष को उभारकर और दुसरे पक्ष को भूलकर हिन्दुओं के खिलाफ तर्कों को मज़बूत करने कि कोशिश करते हैं | और दुसरे कुछेक भाइयों के लिए भी मेरा ये कमेन्ट महत्वपूर्ण है कि वो हमेशा धर्मों को लेकर तर्कों में उलझकर कुत्तों कि तरह लडाई को छोड़ते हुए देश कि वर्तमान समस्याओं कि तरफ ज्यादा ध्यान देंगे तो अच्छा है |

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यदि आप वेद के केवल एक वाक्य को पढ़कर आयें हैं तो फिर इस कमेन्ट को आगे पढने की तकलीफ मत उठायिएगा | आगे बढ़ गए तो ठीक है | मैं विश्व के सभी धर्मों को मूल रूप से पूरब और पश्चिम, इन दो वर्गों में देखता हूँ, मजे कि बात ये है कि अरब यानि कि मध्य पूर्व, न पश्चिम में है और न पूर्व में मतलब मध्य में है और इसमें पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ के गुण हैं, फिर भी मुख्य रूप से मैं इसे पश्चिमी वर्ग मैं ही रखूँगा क्योंकि इस पर पश्चिमी (इसाई और यहूदी ) प्रभाव ही ज्यादा है | इसके अलावा मैं दूसरे तरीके से इसे ऐसे भी कहूँगा कि पश्चिम कि सभ्यता पौरुषिक (मर्दाना) है और पूर्व कि सभ्यता स्त्रीयोचित भाव (जानना मिजाज़) वाली है | जिस तरह पुरुष कठोर होता है और अपनी अति एवं प्रभाव को प्रर्दशित करना और बढाना चाहता है और स्त्री कोमल एवं दूसरो के प्रति सद्भाव वाली होती है वैसे ही पश्चिम के धर्म अपनी प्रधानता ही बनाये रखने कि कोशिश करते हैं और पूर्व के धर्म उसका ज्यादा प्रतिकार नहीं करते |


ठीक है | अब मैं आपको बता दूँ की हिन्दू धर्म वैसा धर्म नहीं है जैसा धर्म पश्चिम या अरब देशों में हैं, और हिन्दू ही नहीं पूर्व (मसलन चीन, जापान, सिंगापूर, बर्मा, थाईलैंड आदि आदि ) के लगभग सभी धर्म पश्चिम और अरब के धर्मों से भिन्न प्रकार के हैं | इसलिए हिन्दू धर्म, पश्चिम या अरब की भाषा में कहूँ तो धर्म ही नहीं है एक सभ्यता या विचारधारा का नाम है और यदि धर्म कहना ही है तो फिर "धर्म" शब्द को हमें थोडा व्यापक करना होगा | शब्दों के गलत अर्थ न लिए जाएँ इस कारण में यहाँ "हिन्दू धर्म" ही लिख रहा हूँ अन्यथा मैं "हिन्दू" शब्द के प्रयोग से बचने की कोशिश करता हूँ और यहाँ आप हिन्दू धर्म के वर्तमान स्वरुप (जिसमे कि गन्दी राजनीती और सत्ता, मूर्ख नेता व गुंडे, चालाक पुरोहित-पण्डे, तथाकथित साधू-महात्मा भी हैं ) की और मत देखिएगा क्योंकि अब उसमे भी कई कमियां समावेशित हो गयी हैं, वर्तमान में बहुत से हिन्दुओं को भी अपने धर्म की बातों का ठीक-ठीक ख्याल नहीं है ख़ास कर अंग्रेजी राज़ के 200 वर्षों के बाद एक विशेष खाई बन गयी है पिछली और अब की सभ्यता के बीच में | अब तो कुल मिलकर 200 साल पुरानी सभ्यता है हमारी, अब तो जो ये कहेगा कि हजारों साल वाली सभ्यता है, तो खुद ही फंस जायेगा यदि इतिहास के बारे में किसी ने कुछ पेचीदा सवाल कर लिया तो | 3-4 पीढियों तक अगर गलत इतिहास दिमाग में बैठा दिया जाये तो अगली पीढियां उसी पर विश्वास करती हैं जो सामने होता है | और अगर दूसरे तरीके में कहूँ तो वर्तमान समय में पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही धर्म है और एक ही सभ्यता है और वो है पश्चिम का धर्म और पश्चिम कि सभ्यता (मतलब ईसाईयों के रिवाज़ और तौर तरीके जिसमे अरब के धर्म सम्मिलित नहीं है, सिर्फ और सिर्फ ईसाईयों कि सभ्यता) !! अगर यहाँ तक की सभी बातें समझ में आ गयी हो तो आगे बढ़ते हैं |


जो वर्तमान समय में हिन्दू सभ्यता चल रही है वह अनुमानतः कोई 20,000 वर्षों से चली आ रही है और इस सभ्यता ने इतने हजारों वर्षों में चेतना (अध्यात्म) सम्बन्धी कई शोध किये हैं | यदि आप ये मानते हैं की पश्चिम ने 500 वर्षों में पदार्थ विज्ञान के शोध के परिणाम स्वरुप जगत को अद्भूत दुनिया में बदल दिया है तो सच मानिये की 20,000 वर्ष का लगातार शोध मायने रखता है पदार्थ के काउंटर पार्ट चेतना के लिए | ऐसा नहीं है की सिर्फ चेतना पर ही शोध हुआ पदार्थ पर भी हुआ होगा और उसकी परिणिति में कई उतार चढाव आये लेकिन ज्यादा समय चेतना के अनुसंधान पर निकला है | मतलब यूँ मानिये कि इस सभ्यता ने भी विनाश और सृजन के पल देखे हैं कई बार पूरी तरह नष्ट होती-होती बची है, बस इस सभ्यता और दुनिया कि बाकि सभ्यताओं में फर्क इतना ही रहा कि इसने अपने को अनवरत जारी रखने के लिए मैनेज कर लिया और दुनिया कि दूसरी सभ्यताएं पूरी तरह ही नष्ट हो गयीं (मसलन मिश्र कि सभ्यता ), इस तरह इसका प्रभाव विश्व में समय-समय पर ज्यादा ही रहा | मजे कि बात है कि भारतीयों में अब भी एडजस्ट होने वाला गुण बड़ा जबरदस्त है, भारतीय नष्ट नहीं होंगे लचीले स्वभाव के कारण अपने अस्तित्व को मेनेज कर लेते हैं, कहीं भी कभी भी | प्रायः आपने देखा होगा कि स्त्री विधवाएं ज्यादा मिलेंगी बनिस्पत पुरुष विधवा के क्योंकि पुरुष अपने कठोर स्वभाव के कारण जल्दी कमजोर होकर मर जाता है लेकिन स्त्रियाँ सामान्यतः लम्बी आयु वाली होती हैं |


तो अब असली पर बात बढ़ता हूँ | भारत में वेद से लेकर उपनिषद, उपनिषद से लेकर अन्य ग्रथों अरण्यक, ब्राहमण गीता इत्यादि बने, और बाद में कई अन्य छोटे-छोटे निज विचारधारा के धर्म जैसे बौद्ध, जैन, सिख फिर उनमे भी कई सप्रदाय, पंथ बन चुके हैं | ऐसा इसीलिए हुआ है क्योंकि यहाँ हर व्यक्ति ने अपनी मौलिक विचारधारा को महत्व दिया और समाज ने भी उसे ऐसा करने पर रोका नहीं, पूर्व के धर्मों ने किसी भी समुदाय पर अपने विचार कभी भी थोपे नहीं हैं | न तो दूसरो के विचारों को दबाया गया है और ना ही ऐसी सोच रही कि सिर्फ हमारा धर्म ही रहेगा और किसी का नहीं और जब तक दुसरे लोग हमारे वाले को न अपना लें तब तक उनका कल्याण नहीं हो सकता (इसाई मानसिकता) और अगर ना माने तो काफिर है, काफिर को मारना सबाब का काम है (इस्लामी मानसिकता), हम बुतपरस्ती नहीं करते तो तुम्हे भी नहीं करने देंगे, सत्ता आने पर बामयान की मूर्तियों को तोड़ देंगे | क्योंकि ये सब बातें बचकानी होती हैं और बूढी सभ्यताएं अपनी समझदारी के कारण उन्हें नज़रंदाज़ करती हैं कि कभी बड़े होंगे तो समझ जायेंगे |


ये यूँ ही अकारण नहीं है कि भारत ही विश्व में सबसे अधिक विविधताओं वाला देश है, यदि यहाँ भी पश्चिमी मानसिकता होती तो, आज जिस तरह कोई भी फिस्सडी छिट-पुट आदमी अपने धर्म या समुदाय को लेकर आये दिन आन्दोलन करने उतर जाता है, ऐसा नहीं होता | भारत ने यूरोप की बर्बर जातियों की तरह दूसरे महाद्वीपों पर जाकर वहां के मूल निवासियों को तबाह नहीं किया है | आपको नहीं पता है तो बता देता हूँ की ईसाईयों ने अमेरिका की खोज के बाद वहां के मूल नागरिकों को जिन्हें रेड इंडियन कहा गया है हजारों की तादाद में मौत के घात उतार दिया, ये जिन्हें आज अश्वेत कहते हैं, ये आज का अमेरिका उन मूल अमरीकीओं की लाशों के ढेर पर खडा हुआ है, और जिनकी संख्या अब अमेरिका में गोरों की तुलना में इतनी कम हो चुकी है की वहां इनको अल्पसंख्यक की लिहाज़ से आरक्षण दिया गया है | कितनी हास्यास्पद बात लगती है ये कभी उस महाद्वीप के मूल निवासी कहलाने वाले लोग आज अल्पसंख्यक कहलाते हैं, नयी पीढियों के ज्यादातर लोग तो उन गोरों को ही , जो सिर्फ 300 साल पहले ही गए हैं वहां पर, वहां का मूल निवासी समझते होंगे | भारत की धरती पर कभी हौलोकास्ट नहीं हुआ, जिसमे तालिबानी कट्टर सोच वाले जर्मनी ने लाखों यहूदियों को इस तरह मारा जैसे कोई गाजर-मूली काटकर उसका ढेर लगा देता हो |
एक बार विकिपीडिया के इस लिंक पर विजिट करके वहां लगी तस्वीरों को देख लीजिये तो पता चले की ऐसे भयावह जीवित और मृत इन्साओं को अगर असल में आमने-सामने देख ले तो दो सेकेण्ड में किसी का भी पाँव भारी हो सकता है |


http://en.wikipedia.org/wiki/The_Holocaust


यदि इस तरह की सोच भारत में भी शुरू से रही होती तो आज मुसलमानों या ईसाईयों या बहार के दूसरे धर्मों के लोग बैठकर यहाँ ब्लॉग नहीं लिख रहे होते | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढोल तक पीटने का मौका नहीं मिलता | क्या आप मान सकते है जितना खुला माहौल सब धर्मों के लोगों को भारत में मिलता है उतना क्या पकिस्तान में मिलता है, देख लीजिये तो पता चले की आये दिन कभी जजिया तो कभी जबरन धर्म परिवर्तन, हिन्दू होने के कारण ठीक से समाज में शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते, इज्ज़त से कमा नहीं सकते जी नहीं सकते | क्या भारत में किसी मुसलमान पर उसके दूसरे धर्म का होने के कारण ऐसा अतिरिक्त कर लगाया जो जजिया की बराबरी करता हो, उल्टे सब्सिडी मिलती है | जब एम. ऍफ़. हुसैन हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाते हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दी जाती है, उधर दूर देश में हज़रत साहब का कार्टून क्या बना हिन्दुस्तान के मुसलमान रेली निकाल रहे हैं, विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं | ये रेली वाले हुसैन की पेंटिंग वाले दिन कहाँ गए थे, और वो हुसैन अगर कभी अपने धर्म या परिवार वालों की कोई आपतिजनक तस्वीर बना देगा तब में उसे सच्चा कलाकार कहूँगा | क्या आप मान सकते हैं जो काम हुसैन ने भारत में कर दिया वो काम पकिस्तान में कोई हिन्दू मुस्लिम धर्म के खिलाफ कर सकता है, मैं नहीं मान सकता | ठीक है खैर आगे बढ़ते हैं |


सबके अपने-अपने तरीके थे और उनको बिना किसी रूकावट के उन तरीकों पर काम करने दिया गया | ये लोग किसी एक ग्रन्थ के बनाये कायदों पर नहीं चलते जो अपने से सही लगता है उस पर चलते हैं | किसी को काम करना हो या कोई निर्णय लेना हो तो हर बार बाइबिल या कुरान कि तरह गीता खोलकर नहीं बैठ जाता है कि वहां क्या लिखा है अमुक काम के लिए | जैसे सारे दिन किसी गोरे और जाकिर नायक के बीच कुरान और बाइबिल को लेकर श्रेष्ठता सिद्ध करने वाली डिबेट नहीं चलती, जिसमे अच्छे वकील की तरह, सही या गलत से कोसों दूर अच्छे तर्क-कुतर्क पेश करने वाला जीत जाता है, अरे भाई जो गुलाब होता है उसको डिबेट नहीं करनी पड़ती ये सिद्ध करने के लिए को वो गुलाब है | कुछ लोगों को अजीब लगेगा की मैं भी यहाँ यही काम तो कर रहा हूँ, चलिए इसका जवाब मैं फिर कभी दूंगा, यदि किसी भाई को जवाब की जल्दी है तो मैं अंत में अपना इ-मेल पता दूंगा सो इ-मेल कर देना |


कोई हार्ड एंड फास्ट रूल नहीं है कि आपको सन्डे या फ्रायडे को ही होली डे या जुम्मा करना है | चर्च या मस्जिद में किसी ख़ास दिन जाना या पांच बार नमाज़ पढने को ही सच्चे धर्मावलम्बी होने का प्रमाण नहीं माना जाता, यहाँ मंदिर न जाने वाले को नास्तिक नहीं समझा जाता है | व्रत रखना कोई जबरदस्ती नहीं है,
लेकिन मैंने अपनी निजी जिंदगी में ऐसे अनुभव देखें हैं जिनमे छोटे बच्चे तक रोजे रखवाए गए और उसकी हालत काफी खराब हो जाने पर भी रोजे को जारी रखवाया गया | वैसे इसके लिए मैं कहूँगा ज्यादातर गंवार लोग ही ऐसा करते हैं, पढ़ा लिखा या समझदार मुसलमान शायद अपने बच्चे को रोजे के लिए मजबूर नहीं करता | परन्तु मैं एक सामुदायिक विचारधारा की बात कर रहा हूँ की कौन कितना ज्यादा कट्टर है | मैं मानता हूँ की कुछ कमियां यहाँ पर भी हैं, आप R.S.S या शिव सेना या बजरंग दल को कट्टर कह तो दीजिये लेकिन क्या उनको आप तालिबान, जैश-ऐ-मोहम्मद या हुजी या अल-कायदा जितना भयानक मान सकते हैं, मैं तो बिलकुल भी नहीं मान सकता | यदि वे वाकई इतने भयानक होते तो आज राजस्थान के बॉर्डर पर जितने हिन्दू शरणार्थी भारत में हर हफ्ते आ रहे हैं, उतने ही मुस्लिम पकिस्तान जा रहे होते |


अब आता हूँ मूर्ति पूजा पर, तो हिन्दुओं में मूर्ति पूजा के विधान भी हैं और बिना मूर्ति पूजा के भी विधान हैं | कोई अग्नि की ज्योति जलाकर ही पूजा कर लेता है तो कोई जल की पूजा कर लेता तो कोई पूजा करता ही नहीं | पतंज़ली ने किसी देवता की नहीं अष्टांग योग से, जो पुर्णतः वैज्ञानिक है, उस एक को पा लिया | कोई एक रंग भी फिक्स नहीं है | जैसी साधना होती है उसी हिसाब से अनुष्ठान और साधन व तरीके हैं | क्या आपने कभी ध्यान नहीं दिया की ये लोग ही डरावनी शक्ल की मूर्तियाँ बनाकर (मसलन काली माँ और लम्बी लिस्ट है भूत या राक्षस जैसे देवताओं की ) भी पूजते हैं और सौम्य सुन्दर मूर्तियों की भी पूजा करते हैं | यहाँ नेकी-बदी, God-Satin जैसी कोई कल्पना नहीं है, चीन में तो इस नेकी-बदी पर एक पूरा कॉसेप्ट है जिसे ताओ दर्शन के नाम से जाना जाता है, जो अच्छाई और बुराई दोनों को दुनिया के अस्तित्व के लिए जरूरी मानता है, उसका अध्ययन कभी समय मिले तो कर लीजियेगा | इस सम्बन्ध में एक मजेदार वाकये भी उल्लेख करना चाहूँगा, एक बार मेरे एक मुस्लिम दोस्त ने मुझसे व्यंग्य करते हुए पूछा था की तुम लोग सुन्दर देवियों-नारियों की मूर्तियाँ क्यों बनाते हो, भक्ति के समय क्या तुम्हे उन्हें देख कर काम-वासना नहीं उठती, तब मैंने उसे यही कहा था की मेरे भाई तुम्हे लक्ष्मी माँ की सौम्य मूर्ति तो दिखी लेकिन काली माँ की डरावनी मूर्ति को नज़रंदाज़ कैसे कर दिया, जिसे अगर कोई आदमी उस हिसाब से देखे शायद तत्काल नपुंसकता को प्राप्त हो जाये, हा हा हा | ये मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि पश्चिम के धर्मों में प्रकाश, नेकी, अच्छाई को बढ़िया माना गया है और अँधेरे, बदी को बुरा माना गया है | जबकि ताओ (ताओ ने तो पूरी इसी कांसेप्ट पर रिसर्च कि है) या पूर्व या भारत के धर्मों में ऐसा नहीं है |


खैर | आगे बढ़ता हूँ | तय है की किस साधना में किस निश्चित रंग का प्रयोग करना है, और ये रंग साधना के हिसाब से बदल जाते हैं, ये मत समझियेगा की भगवा रंग ही हिंदुत्व का प्रतीक है | हर वार के हिसाब से भी देवताओं की साधना के लिए रंग फिक्स हैं, जिनमे काले, पीले, सफ़ेद, नारंगी, नीले, हरे से लेकर दुसरे बहुत से रंगों वाले कपडे पहनने का विधान हैं और ये सब आपकी चेतना को प्रभावित करने के हिसाब की व्यवस्था है | केवल हरा या सफ़ेद फिक्स नहीं है | मतलब हजारों तरीके और हजारों तरह की बातें है | यहाँ द्वैत का सिद्धांत भी है और अद्वैत का भी | मतलब एक इश्वर की विचारधारा भी है और उसके अनेक रूपों की विचारधारा की कल्पना भी की गयी है | कोई अग्नि को पूजता है कोई जल को | अगर आप एक-एक करके किन्ही हिन्दू मंदिरों में मूर्तियाँ या फोटो देखेंगे तो आपको स्पष्ट हो जायेगा कुत्ते बिल्ली से लेकर हाथी, शेर, गाय | छोटे बच्चे से लेकर एकदम बुढे रूप वाले देवी देवता मिलेंगे वो सब अकारण नहीं है, किसी विशेष तरीके या रास्ते की तरफ इशारा करते हैं |


यहाँ सबका अपना ही निराला ढंग है उस एक तक पहुँचने का | कोई एक हार्ड एंड फास्ट रूल नहीं है की सबको सिर्फ एक जीसस या एक मुहमद को ही मानना पड़ेगा | एक ही तरीका-पद्धति को फोलो करो ऐसा भी दबाव नहीं है | एक पोप या एक खलीफा भी नहीं होता जो किसी कंपनी या राजनितिक पार्टी कि तरह एक विशेष आचार सहिंता को नियंत्रित करने का काम संभालता हो | यहाँ मैं यह भी उल्लेख कर दूँ कि कोई ये न समझे कि मुझे इस बात का ख़याल नहीं है कि इसाई, यहूदी या इस्लाम में भी कई सम्प्रदाय या पंथ है, लेकिन सच ये भी है कि उनका आंकडा हिन्दुस्तान के सामने समंदर में बूंद के समान है |


ये कुछ इस तरह है, जैसे आज अमेरिका पदार्थ विज्ञान की तकनीकों के मामले में विश्व का राजा है | हम सब कभी कभार वहां से तकनीकों के महासागर का कुछ अंश सीख आते हैं और उस एक तकनीक पर ही ज्यादा जोर देना शुरू कर देते हैं क्योंकि वो ही हमें आती है | कोई देश केवल सोफ्टवेयर तकनीक में महारत हासिल कर रहा है, कोई सिर्फ हथियारों और बंदूकों की तकनीक में पारंगत हो रहा है | कोई मेडिकल में तो कोई किसी और में | लेकिन अमेरिका ये थोडी कहेगा की बन्दूक वाली तकनीक सोफ्टवेयर तकनीक से ज्यादा बढ़िया है, उसके पास तो सारे पदार्थ विज्ञान को लेकर इतना बड़ा महासागर है कि वो किसी एक को वो कम या ज्यादा महत्व का नहीं बता सकता | हम लोग तो मुश्किल से कोई एक-दो चीज़ वहां की ठीक से सीख पाते हैं आज | अगर कोई आगे जाकर कहेगा कि भाई साहब ये चीज़ तो हमारे देश सदा से ही बनती आई है तो उसके बारे अमेरिका वाले बेचारे कितना ही कहें एह्सान्फरामोशों सारी चीज़ हमीं से सीख कर गए अब हमें ही धौंस दिखा रहे हो, तो कौन मानने वाला होगा | कुछ ऐसा ही आप भारत के लिए चेतना या अध्यात्मिक शोध के बारे में समझिये | भारत के पास तो हजारों साधनाएं, हजारों तरीके हैं | कोई एक तरीका किसी देश ने सीखा तो कुछ किसी ने और लग गए हाथ धोकर उसी एक के पीछे | जिस तरह आज सभी लोग अमेरिका में पढने का सपना संजोये रहते हैं और मौका मिलने पर वही कूद पड़ते हैं, उसी तरह एक समय ऐसा भी था जब लोग भारत के विश्वविद्यालयों में पढने कोई लालायित रहते थे और हर किसी ने थोडा बहुत सीख कर उस ज्ञान को अपने देश में आगे बढाया, परन्तु कोई एक आदमी तो सारे धर्म के सारे शोधों और तरीकों के ज्ञान को तो अपने देश में नहीं ले जा सकता ना, ठीक वैसे ही जैसे कोई एक इंजिनियर या डॉक्टर सारी तकनीक अमेरिका से एक साथ भारत में नहीं ला सकता है |

तो भाई साहब मेरी भी आपसे गुजारिश है की आप भी बिना पूरी पड़ताल किये आगे से ये मत लिखियेगा की हिन्दू सिर्फ मूर्तिपूजक है और वेद में मूर्तिपूजा नहीं है |

- यहाँ किसी ने उसे वाम (उल्टे) मार्ग से पाया


- और किसी ने दक्षिण (सीधे) मार्ग से |


- किसी ने बिना किसी देवता को पूजे उसे अष्टांग योग (ध्यान और कुछ विशेष शारीरिक क्रियाओं) के द्वारा ही पा लिया और "अहम् ब्रम्हा अस्मि" ( मैं ही ब्रह्म हूँ) की घोषणा की (कोई मूर्ति-पूजा पाठ नहीं)


- तो किसी ने कहा मेरे "तो गिरधर गोपाल और दूजा न कोई" |(अतुलनीय मूर्ति-पूजा)


- कहीं कोई ग्वाला गीता में केवल कर्तव्य और कर्म को ही सच्चा धर्म बताता है और युद्घ को समयोचित ठहराता है |


- खजुराहो को हम मंदिर कहते हैं, इसाई या मुस्लिम तो शायद सपने में भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकते कि काम (सेक्स) के विषय भी धर्म से या मस्जिद से या गिरजे से सम्बन्ध रखते होंगे | यहाँ कामदेव और रति देवी भी हैं, लिंग पूजा और योनी पूजा भी है |


- हवन और बलियां भी हैं |(हिंसा, मांस, मदिरा)(कभी कामख्या, गुवाहाटी घूम कर आईये)


- जैन और बौद्ध भी हैं जो करुणा, दया और अहिंसा, जीवों पर दया का पथ सिखाते हैं | (जो तालियाँ भी सही से नहीं बजाते की कहीं हवा में सूक्ष्म जीवाणू न मर जाये)


- द्वैत विचारधारा भी है, अद्वैत विचारधारा भी है |


- एकेश्वरवाद भी और अनेकेश्वरवाद भी है |


- सगुण भक्ति भी है और निर्गुण भक्ति भी है | (इन शब्दों का मतलब तो आप समझते होंगे ना, क्या ही सुन्दर विवेचना की है सूरदास ने निर्गुण विचारधारा वाले उद्धव को सगुण विचारधारा वाली गोपियों के सामने लाकर खडा कर दिया है)


- किसी के लिए वो केवल एक परम ब्रह्म है, दूजे के लिए उसके 36 करोड़ देवीय रूप हैं |


- गृहस्थी वाले भी महान ऋषि हुए हैं और अकेले बाल ब्रह्मचारी भी महान ऋषि हुए हैं |


- सांप और गायों को पूजने वाला ये देश किसी एक विचारधारा या पद्धति से हमेशा चिपटा हुआ नहीं रहा है |


- लम्बी जटाओं और दाढ़ी वाले साधू भी हैं तो सफाचट मुंडी वाले सन्यासी भी हैं | और सामान्य शेव करने वाले और सर के बाल सामान्य साइज़ के रखने वाले भी बड़े महात्मा हुए हैं |


- एक तरफ नर मुंडो की माला पहने खप्पर में रक्त डालकर पीती हुई काली है तो दूसरी तरफ कमल पर बैठी वीणा लिए हुए सरस्वती भी है |


- वैरागी पहाडों और श्मशान में रहने वाले शिव को मानने वाले भी हैं उसके एकदम उल्टे महलों में रहने वाले ऐश्वर्यशाली कृष्ण को भी मानने वाले हैं |


- अपने को सभ्य और विकसित कहने वाले लोग पहले अपने नादान इतिहास पर भी गौर फरमा लें |


- ये सब आपको ऊपर से देखने पर विरोधाभासी लग सकता है, परन्तु ऐसा है नहीं | हिन्दू धर्म के पास गहरा तत्त्व दर्शन है | इतना सीधा और छोटा मामला नहीं जितना आप समझ रहे हैं | समझने बैठो तो पूरी जिंदगी निकल जाये आदमी की फिर भी बाकी रह जाये |


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ये सब होता है यहाँ भारत में और वो भी बिना किसी मतभेद के और मतभेद होगा ही क्यों सब अपने-अपने तरीके निकालते रहे हैं शोध कर-कर के | क्या अमेरिका का कोई इंजीनियर दूसरे से इस बात पर बहस करेगा की उसकी तकनीक ज्यादा अच्छी है बजाय दूसरे के, नहीं, वो जानते हैं सबकी खोज अपनी जगह सामान महत्व वाली है | ये दूसरी बात है कि अभी खुद हिन्दुओं कि नासमझी के कारण कई मतभेद पैदा हुए हैं लेकिन ये हुए हैं नई पीढी में गलत शिक्षा के फैलने से | सुनियोजित तरीके से संस्कृति का नाश करने से (खासकर अंग्रेजों का इसमें काफी बड़ा हाथ रहा है )| इस देश के लोगों को पिछले 1,000 साल कि गुलामी के कारण कई महत्वपूर्ण बातों हाथ धोना पड़ा है | इतने सालों में बहार से आई दूसरी संस्कृतियों को इसने अपने अन्दर समाविष्ट तो कर लिया लेकिन उन संस्कृतियों की अच्छे गुणों के अलावा कई गंदे वायरस भी आ गए जो अब फोडे बनकर उभर गए है मुझे नहीं पता ये देश पूरी तरह स्वास्थ्य लाभ कब तक करेगा |

लेकिन मेरा तो यही मानना है कि दुनिया के दुसरे देशों के स्वार्थी व्यवहार को देखते हुए, इस देश को अब अपने परोपकार और अहिंसा (असल में कायरता और गुलामी वाला व्यवहार जिसे भारतीय लोग अहिंसा जैसे शब्दों के आभूषण की तरह ओढ़ते हैं ) के रास्ते को छोड़ देना चाहिए | और चीन से सबक लेते हुए किसी एक कट्टर संकल्पना कि और बढ़ना चाहिए जिसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक राष्ट्र के हितों को साधना होना चाहिए |

एक और बात ये की ईसाईयों में तो फिर भी अब काफी खुलापन आ गया है, पुनर्जागरण के बाद से| पुनर्जागरण के पहले के हालात तो आप सभी को पता ही होंगे की यूरोप में भी कितने हास्यास्पद, घृणित और बड़े मूर्खता वाले काम हुए हैं | वहां अब नए और अलग विचार वाले लोगों का नाश नहीं किया जाता उनमे अभी इतनी कट्टरता नहीं रह गयी है जितनी अभी मुस्लिमों में बाकी है | तुर्की को छोड़ के अन्य किसी मुस्लिम देश ने नए मूल्यों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है | इधर भारत ने पिछले 500-600 वर्षों में कई रूढियां पकड़ ली थी, लेकिन अब फिर से नया दौर चला है, परन्तु अपने असली गुणों को रिकवर करना भारत के लिए काफी मुश्किल है | स्पष्टतः यहाँ यह भी कह दूँ कि नए दौर का मतलब अमेरिका के पीछे चलना ही नहीं होता है सारी रवायतें पश्चिम की हमेशा ही सही हों ऐसा भी जरूरी नहीं | 100 साल पहले कह रहे थे परमाणु ऐसा होता है, आज कह रहे हैं नहीं वैसा होता है कल कुछ और कहेंगे | विकसित होते विज्ञान से सीधे अपनी मौलिक खोज किये बिना नक़ल करके उठा लेने पर हम उनके पीछे ही चलते रहेंगे | इसलिए इतनी जल्दी भी वहां का जंक फ़ूड उठा कर मत लाओ यारों की पता चला वही अब कह रहे है जंक फ़ूड नुकसान करता है | तब फिर खुद ही पछताओगे की जंक फ़ूड के चक्कर में जिन गायों को तुमने ख़तम होने के कगार पर ला दिया की अब शहरों में तो उनके दूध के दर्शन भी मुश्किल हो गएँ हैं | मतलब भैया धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का वाली स्थिति हो जाने वाली है फिर तो |

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ऊपर लिखी सारी कमेंट्स को लिखने के बाद मैं एक और विशेष कमेन्ट लिखना चाहता हूँ मेरे इन सारे कमेन्ट को पढने वाले लोग मुझे अति हिंदूवादी, कट्टरवादी, इसाई व मुस्लिम विरोधी या सेकुलरिस्ट या किसी ख़ास वर्ग, धर्म, समुदाय, जाति के पक्ष या विपक्ष में होने वाला व्यक्ति समझ रहे हैं तो ये उनकी ग़लतफ़हमी ही होगी, उनके लिए मैं अफ़सोस जाहिर करता हूँ | अगर कभी समय मिला तो इस मैं इस कमेन्ट को अपने ब्लॉग पर और भी अच्छी और विस्तृत चर्चा के रूप में लिखूंगा |

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आपके सुझाव/शिकायत जरूर टिप्पणी के रूप में दें | यदि कोई अपना गुस्सा या ख़ुशी सार्वजनिक रूप से नहीं व्यक्तिगत रूप से जाहिर करना चाहता है तो मेरा इ-मेल पता है,


yss.rajneesh@gmail.com


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3 comments:

  1. भाई साहब आपने जो लिखा है उसकी तारीफ करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं |
    साहित्य और धर्म आपके कृतज्ञ रहेंगे |

    पाखंडियों को आईना दिखलाने के लिए धन्यवाद ||

    ||' सत्यमेव जयते ' ||

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